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शासकीयकरण नहीं तो आर-पार की लड़ाई! 11 हजार पंचायत सचिव आंदोलन की राह पर, समिति की रिपोर्ट में देरी से बढ़ा आक्रोश


नवंबर-दिसंबर में संगठन का कार्यकाल खत्म, चुनाव से पहले तेज हुई हलचल; तीन साल के कार्यकाल में "वादे बनाम उपलब्धि" का हिसाब भी होगा अहम


समिति रिपोर्ट पर टिकी 11 हजार सचिवों की निगाहें, शासन से ठोस निर्णय की मांग

पंचायत सचिव संगठन में चुनावी सरगर्मी तेज, नए नेतृत्व से निर्णायक संघर्ष की उम्मीद

शासकीयकरण की मांग को लेकर फिर उबाल, चरणबद्ध आंदोलन की रणनीति पर मंथन

*रायपुर।* प्रदेश के करीब 11 हजार ग्राम पंचायत सचिवों में एक बार फिर आक्रोश तेज हो गया है। लंबे समय से लंबित शासकीयकरण की मांग और इसके लिए गठित समिति की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं होने से सचिवों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। अब सचिवों ने साफ कर दिया है कि अगर जल्द ठोस निर्णय नहीं हुआ तो आर-पार की लड़ाई लड़ी जाएगी।

प्रदेशभर में सचिव संगठन स्तर पर आपसी संवाद के जरिए आगे की रणनीति पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। चर्चा है कि जल्द ही बड़े और निर्णायक आंदोलन की रूपरेखा तय की जा सकती है।

*समिति की रिपोर्ट पर टिकी निगाहें*


शासकीयकरण को लेकर गठित समिति की रिपोर्ट ही अब सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है। लंबे संघर्ष के बाद समिति बनी तो सचिवों में उम्मीद जगी थी, लेकिन रिपोर्ट में लगातार देरी से निराशा बढ़ रही है। सचिवों के बीच अब एक ही सवाल है - रिपोर्ट कब आएगी और शासन शासकीयकरण पर फैसला कब लेगा?

*आंदोलन के लिए विशेष रणनीति पर मंथन*
आगामी दिनों में प्रदेश स्तरीय बैठक में आंदोलन की रूपरेखा तय हो सकती है। इस बार आंदोलन सांकेतिक नहीं, बल्कि चरणबद्ध, संगठित और प्रभावी होगा। सचिवों का कहना है कि अब मांगों को केवल आश्वासन तक सीमित नहीं रखा जा सकता, इसके लिए स्पष्ट समयसीमा और ठोस निर्णय चाहिए।

*नवंबर-दिसंबर में संगठन का कार्यकाल समाप्त*


प्रदेश पंचायत सचिव संगठन का वर्तमान कार्यकाल नवंबर-दिसंबर में समाप्त हो रहा है। इसे देखते हुए संगठन चुनाव की हलचल भी तेज हो गई है। प्रदेशभर के ऊर्जावान सचिव सक्रिय हो गए हैं। इस बार चुनाव केवल पद चयन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शासकीयकरण, सेवा-सुरक्षा और लंबित मांगों पर संघर्ष की दिशा भी तय करेगा।

*तीन साल का कार्यकाल भी कसौटी पर*


तीन साल के कार्यकाल का मूल्यांकन भी चुनाव में अहम मुद्दा बनेगा। सचिवों में चर्चा है कि प्रमुख मांगों, खासकर शासकीयकरण पर अपेक्षित उपलब्धि नहीं मिली। ऐसे में "संघर्ष बनाम उपलब्धि" और "वादे बनाम परिणाम" चुनाव में हावी रहेगा। सचिव अब केवल आश्वासन नहीं, परिणाम देने वाली रणनीति चाहते हैं।

*नए नेतृत्व से निर्णायक संघर्ष की उम्मीद*


सचिव ऐसे नेतृत्व की तलाश में हैं जो ज्ञापन और बैठकों से आगे बढ़कर शासन से प्रभावी संवाद कर सके और जरूरत पड़ने पर निर्णायक आंदोलन का नेतृत्व कर सके।

फिलहाल सबकी निगाहें समिति की रिपोर्ट और शासन के फैसले पर टिकी हैं कि 11 हजार सचिव किस रणनीति के साथ मैदान में उतरते हैं।

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